गुज्जर की गाड़ी


gujjar on cars
दोस्तों कुछ समय पहले किसी अखबार में एक लेख छपा था जिसके अनुसार एक व्यक्ति ने अपनी गाड़ी से एक विदेशी यात्री की गाड़ी को टक्कर मार दी थी और जब यात्री पुलिस थाने में इसकी रिपोर्ट लिखवाने जाता है तो एक बहुत ही रोचक किस्सा सामने आता है।

थाने में जब पुलिस वालों ने पूछा कि ‘गाड़ी कौनसी थी, गाड़ी का नंबर याद है क्या ?’ तो विदेशी यात्री का कहना था
‘‘सर, गाड़ी पर नम्बर तो नहीं था, पर ‘गुज्जर’ कंपनी की गाड़ी थी ।’’
इस बात को सुनकर वहां उपस्थित सारे पुलिस वालें हंस पड़े। मुझे भी ये लेख पसंद आया, तो सोचा आपके साथ भी शेयर कर दूं।
दोस्तों दिल्ली एनसीआर में गुज्जर एक सम्पन्न वर्ग है और महंगी-महंगी गाड़ियां रखना इनका शौक है। ये अपनी गाड़ियों पर अक्सर अपनी जाति, गोत्र या चैधरी आदि लिखवाना पसन्द करते है इनमें से कुछ लोगों का कहना है कि
‘‘हमारे बाप-दादा किसान है और अब हम गांवों को छोडकर शहरों में बस गये है हम अपनी पहचान नहीं छोड़ना चाहते है, हमें अपने जाति पर गर्व है और कुछ का कहना है कि जाति देखकर कोई पंगा लेने की हिम्मत नहीं करता है।’’

विड़ियों श्रृंखला की इस विड़ियों में आज हम देखेंगे कि दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में गुर्जर समाज के लोग अपनी गाड़ीयों के पीछें अपनी जाति लिखवाना क्यों पसन्द करते है।
गाड़ी पर गुज्जर
Video credit:- The Quint
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‘‘कार स्टिकर जो जाति, धर्म, पेशे और राजनीतिक संघ को निरूपित करते हैं, अवैध हैं। मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 177 में इस तरह के उल्लंघन के लिए अधिकतम जुर्माना पहली बार के लिए 100 रुपये और बाद के लिए 300 रुपये है।’’
दोस्तों हम जातिवाद को बढ़ावा नही देते है। परन्तु समाज की एकता हमारे लिए महत्वपूर्ण विषय है। समाज संगठित है तो देश संगठित है। गुर्जर समाज हर वर्ग का खुलकर साथ देता है, सम्मान करता है परन्तु किसी गाड़ी पर गुर्जर लिखा देखकर हमें अपने पन का एहसास होता है। समाज की एकता का एहसास होता है।

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