चौधरी रहमत अली


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चौधरी रहमत अली को ‘पाकिस्तान’ शब्द गढ़ने और मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की कल्पना करने का श्रेय दिया जाता है।
इनका जन्म 1897 में भारत के पंजाब राज्य के होशियारपुर जिले के बलाचौर में एक गुर्जर मुस्लिम परिवार में हुआ था। 1910 में इन्होंने म्यूनिसिपल बोर्ड मिडल स्कूल ऑफ राहन से अपना एंग्लो-वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल सर्टिफिकेट लेने के बाद, 1912 में साईंदास एंग्लो-संस्कृत हाई स्कूल, जलंधर से अपना फाइनल उत्तीर्ण किया।
सन् 1918 में इन्होंने इस्लामिया कॉलेज, लाहौर से बीए की डिग्री प्राप्त की। कुछ समय के लिए आइचिसन कॉलेज, लाहौर में पढ़ाया। फिर कानून की पढ़ाई करने के लिए पंजाब विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। सन् 1930 में एम्मानुएल कॉलेज कैंब्रिज में दाखिला लेने के लिए इंग्लैंड चले गए। इन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से 1933 में बीए की डिग्री और 1940 में एमए की डिग्री प्राप्त की। इसी समय से वे एक पृथक मुस्लिम राष्ट्र की कल्पना अपने दिल में संजोने लगे थे।

28 जनवरी, 1933 को इन्होंने अपना पहला यादगार पैम्फलेट " Now or Never: Are We to Live or Perish for Ever? ” जिसे पाकिस्तान घोषणापत्र के रूप में भी जाना जाता था, में पहली बार पाकिस्तान शब्द को गढ़ते हुए एक अलग राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान बनाने के लिए कारण दिए।
‘‘हमारा धर्म और संस्कृति, इतिहास और परंपरा, सामाजिक कोड, आर्थिक व्यवस्था, उत्तराधिकार के कानून और विवाह मूल रूप से शेष भारत में रहने वाले अधिकांश लोगों से भिन्न हैं। वे आदर्श जो हमारे लोगों को सर्वोच्च बलिदान करने के लिए आगे बढ़ाते हैं, वे अनिवार्य रूप से उन लोगों से अलग हैं जो हिंदुओं को ऐसा करने के लिए प्रेरित करते हैं। ये अंतर बुनियादी सिद्धांतों तक ही सीमित नहीं हैं। इससे दूर वे हमारे जीवन के न्यूनतम विवरण का विस्तार करते हैं। हम अंतर-भोजन नहीं करते, हम अंतर-विवाह नहीं करते हैं। हमारे राष्ट्रीय रिवाज और कैलेंडर, यहां तक कि हमारे आहार और पोशाक भी अलग हैं।’’

- जनवरी 1933 में चौधरी रहमत अली

इनके पैम्फलेट में पाकिस्तान के मुसलमानों का स्पष्ट और संक्षिप्त वर्णन था, जिसने बाद में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के दो-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी। इस आधार पर देखा जाए तो उनकी ये एक पृथक राष्ट्र की मांग कई हद तक जायज भी थी।
यह पैम्फलेट इन्होंने तीसरे गोलमेज सम्मेलन में इस प्रसिद्ध कथन के साथ प्रस्तुत किया कि:-
“भारतीय इतिहास केे इस महत्वपूर्ण समय में, जब ब्रिटिश और भारतीय राजनेता उस भूमि के लिए एक संघीय संविधान की नींव रख रहे हैं, हम हमारे तीस मिलियन मुस्लिम भाइयों की ओर से जो पाकिस्तान में रहते हैं - जिनके द्वारा हमारा मतलब है भारत की पाँच उत्तरी इकाइयाँ, जिन में पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (अफगान प्रांत), कश्मीर , सिंध और बलूचिस्तान है, इस अपील को संबोधित करते हैं कि हमारी आम विरासत के नाम पर, भारत के बाकी हिस्सों से अलग एक राष्ट्रीय स्थिति को अलग अनुदान द्वारा सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक आधार पर मान्यता दी जाए और हमें एक अलग संघीय संविधान प्रदान किया जाए।’’
इन्हें सिर्फ एक छात्र मानते हुए इनकी घोषणा को सभी पक्षों के नेताओं ने खारिज कर दिया।
ये गोलमेज सम्मेलनों के परिणाम से खुश नहीं थे। इनका का मानना था कि राष्ट्र का बलिदान किया जा रहा है, गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने एक अखिल भारतीय महासंघ के सिद्धांत को स्वीकार करके अक्षम्य दोष और धोखा किया है।

इन्होंने 1933 में पाकिस्तान राष्ट्रीय आंदोलन की स्थापना की। इस आंदोलन ने भारतीयता के खिलाफ लड़ाई लड़ी। कैंब्रिज में रहते हुए इन्होंने 1947 तक कई पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया। इनका मानना था कि पाकिस्तान बनाने के लिए सबको एकजुट होकर सामने आना होगा। लेकिन ये कभी भी सांप्रदायिक दंगों और हत्याओं के पक्ष में नहीं थे। भारत के विभाजन के समय बड़े पैमाने पर हुई हत्याओं और पलायन ने इन्हें बिखेर कर रख दिया था।

पाकिस्तान बनने के बाद अप्रैल 1948 में देश में रहने की योजना बनाकर ये पाकिस्तान लौट आए, आगमन के बाद से ही पाकिस्तान के निर्माण से नाखुश थे। वो पाकिस्तान, जिसकी कल्पना इन्होंने अपने 1933 के पर्चे ‘नाउ ऑर नेवर’ में की थी, ये उसकी तुलना में एक बहुत छोटा देश था उन्होंने इस छोटे से पाकिस्तान को स्वीकार करने के लिए जिन्ना की निंदा की, उसे ‘क्विजलिंग-ए-आजम’ कहा।

कुछ समय पाकिस्तान में बिताने के बाद ही इनके सामान को जब्त कर लिया गया और इन्हें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान द्वारा निष्कासित कर दिया गया । अक्टूबर 1948 में ये खाली हाथ इंग्लैंड चले गये। 20 फरवरी 1951 में कैंब्रिज में इनकी मृत्यु हो गई और इन्हें न्यूमार्केट रोड कब्रिस्तान कैम्ब्रिज यूके में दफनाया गया। थेल्मा फ्रॉस्ट के अनुसार, ये अपनी मृत्यु के समय ‘निराश्रित, निराश और अकेले’ थे। इमैनुअल कॉलेज के इनके एक शिक्षक ने इनको कैम्ब्रिज में दफन की व्यवस्था की थी।

इस तरह इस गुर्जर महापुरूष ने अपने संघर्ष से अपनी एक अमिट छाप इस दुनिया पर छोड़ी। भले ही ये एक सार्वभौमिक हिन्दुस्तान के समर्थक नहीं थे, परन्तु जिस मुस्लिम समुदाय से ये आते है इस समुदाय के लिए इन्होंने एक आजाद और सम्पन्न राष्ट्र का सपना संजोया था। इन्हें शत्-शत् नमन है।

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References:- www.open.ac.uk       www.herald.dawn.com         www.historypak.com

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